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Swami Vivekanand Successful Tips of Life

 आज  बहुत ही ख़ुशी का दिन है, स्वामी विवेकानंद जी की 154 वीं  जयंती के अवसर पर लिखित ये विचार आपके समक्ष प्रस्तुत है –                          

” जिनके ओजस्वी वचनों से गुँज उठा उठा विश्व गगन,
वही प्रेरणा पुंज हमारे स्वामी पूज्य विवेकानंद !
जिनके माथे गुरु कृपा थी, दैविक गुण आलोक भरा !
अदभुत प्रज्ञा प्रकटी जग में,धन्य-धन्य वह पुण्य धरा,
सत्य सनातन परम ज्ञान का,
सत्य सनातन परम ज्ञान का,जो करते अभिनव चिंतन!
वही प्रेरणा पुंज हमारे स्वामी पूज्य विवेकानंद ! “

                             
 दुनियाभर में भारतीय आध्यात्म का परचम लहराने वाले स्वामी विवेकानंद  जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ.भारत की गौरवशाली परंपरा और संस्कृति के प्रति न केवल भारतीयों के मन में आत्मसम्मान और आत्मविश्वास का संचार किया, बल्कि नवभारत के निर्माण की रुपरेखा तैयार करने के साथ ही नवसृजन की भी शुरूआत की!
 स्वामी विवेकानंद  जी युवाओ को आह्वान करते हुए कहते हैं कि –

 
युवा ही है जो इस समाज को आत्मशक्ति दे सकते हैं ,संपूर्ण विश्व में संवाद एवं सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं                  
  ” क्योकि आज दाँव पर लगा देश का, स्वाभिमान सेनानी ,
            और पड़ा सोया तू कैसे, जगवीर बलिदानी, सोया जगवीर बलिदानी ” 

                       आज देश में युवाओं  की  भागीदारी को लेकर बहस छिड़ि हुई है, हर तरफ यही सवाल है कि आखिर हम युवाओं को किस तरह विकास के राह में सारथी बना पाएंगे !
                       इस सवाल का एक ही जवाब हो सकता है कि युवा अपना आदर्श एक ऐसे व्यक्ति को बनाए जो वाकई जमीनी स्तर पर युवाओ के लिये कर्तव्व्यबद्ध होते हैं, ऐसे ही अहम आदर्श हैं- स्वामी विवेकानंद जी !


 स्वामी विवेकानंद  जी का कथन है कि –
मुझे सपनों के भारत, ऊर्जा से परिपूर्ण भारत के निर्माण के लिये केवल १०० युवाओं की आवश्यकता है, १०० ऊर्जावान युवाओं के बल पर मैं सपनों  के भारत का निर्माण कर सकता हूँ !
क्योंकि- 
                       

                                              

        अगर हम नहीं देश के काम आये,
            धरा क्या कहेगी गगन क्या कहेगा !
                चलो श्रम करें, देश अपना सवारें,
                      युगों  से चढ़ी ये खुमारी उतारें!
                        अगर हम नहीं वक्त पर जग पाएं,
                     तो सुबह  क्या कहेगी, चमन क्या कहेगा!
                              अगर हम नहीं देश के काम आएं,
                              धरा क्या कहेगी ,गगन क्या कहेगा!

39 वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद जी जो काम कर गए, वे आने वाली अनेक शतापदियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे!
आज भी परिभाषित है, उनकी ओजभरी वाणी से निकले हुए वचन;
                            
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वारण्यबोधत !
                     

अर्थात उठो,जागो, स्वयं जलकर औरों को जलाओ,अपना जीवन श्रेष्ठ बनाओं!और तब तक रुको नहीं जब तक अपने लक्ष्य पर न पहुच जाओ !

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